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विदेशों से उठी दिलीप कुमार को भारत रत्न देने की मांग

फेसबुक पर दिलीप कुमार को भारत रत्न दिलाने की मुहिम में हर दिन सैकड़ों लोग जुड़ रहे हैं और जिनमें न केवल भारत के बल्कि पाकिस्तान और बंगलादेश से लेकर ब्रिटेन और अमरीका जैसे देशों में रहने वाले लोग भी शामिल हैं।

फेसबुक पर शुरू किये गये गु्रप ‘‘दिलीप कुमार फार भारत रत्न ‘‘ के पटल/वाल/ पर सैकडों लोगों ने अपने संदेश लिखे हैं जिनमें दूसरे देशों में रहने वालों की भी भारी तादाद है।
अमीरका के न्यू जर्सी साबिया सिद्दिकी लिखती हैं कि दिलीप कुमार अपने आप में एक इंस्टीच्यूशन हैं। वह वाकई भारत रत्न के हकदार हैं।
अमरीका के बोस्टन के एहसान नूरजई लिखते हैं, दिलीप कुमार न केवल भारत के लिये बल्कि पूरे उपमहाद्वीप के लिये अभिनय के आदर्श हैं।
बंगलादेश के फिरोज रेजा लिखते हैं जब मेरे केबल टीवी पर दिलीप कुमार की कोई फिल्म आती है तो मैं अपने सारे काम छोड़ कर टेलीविजन के सामने बैठ जाता हूं।  Continue reading विदेशों से उठी दिलीप कुमार को भारत रत्न देने की मांग

जब सिनेमा देखना भी सपना होता था

अपनी बात
हमारे देश में क्रिकेट की तरह सिनेमा भी एक धर्म है और सिनेमा के सितारे चाहने वालों के लिये भगवान हैं। सिनेमा के प्रति यह जुनून आज से नहीं है, यह तभी से है जब सिनेमा तक हर लोगों की पहुंच नहीं होती थी। आज तो सिनमा टेलीविजन, वीसीडी और इंटरनेट के जरिये घर-घर में पहुंच गया है। बड़े ‘ाहरों ही नहीं, छोटे ‘ाहरों और कस्बों में भी मल्टीप्लेक्स की भरमार हो गयी है। ऐसे में आज फिल्म देखने के लिये किसी तरह की जद्दोजहद करने की जरूरत नहीं है। आज फिल्म देखने के लिये न किसी इंतजार की जरूरत है, न माता-पिता की मेहरबानी की और न ही टिकट खरीदने के लिये घ्ंाटों लाइन में खड़े होने की और न ही सिनेमा हॉल में घुसने के लिये धक्का-मुक्की करने की, लेकिन एक समय था जब फिल्म देखना युद्ध जीतने के समान होता था और फिल्म देखकर आना एक उपलब्धि हासिल करने की तरह होती थी। उस समय स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिये ही नहीं, कॉलेज में पढ़ने वाले छात्रों के लिये भी फिल्म देखना बड़ी बात होती थी। उस समय के लाखों-करोड़ों बच्चों के लिये फिल्म देखना एक सपने की तरह था। Continue reading जब सिनेमा देखना भी सपना होता था