जब सिनेमा देखना भी सपना होता था

अपनी बात
हमारे देश में क्रिकेट की तरह सिनेमा भी एक धर्म है और सिनेमा के सितारे चाहने वालों के लिये भगवान हैं। सिनेमा के प्रति यह जुनून आज से नहीं है, यह तभी से है जब सिनेमा तक हर लोगों की पहुंच नहीं होती थी। आज तो सिनमा टेलीविजन, वीसीडी और इंटरनेट के जरिये घर-घर में पहुंच गया है। बड़े ‘ाहरों ही नहीं, छोटे ‘ाहरों और कस्बों में भी मल्टीप्लेक्स की भरमार हो गयी है। ऐसे में आज फिल्म देखने के लिये किसी तरह की जद्दोजहद करने की जरूरत नहीं है। आज फिल्म देखने के लिये न किसी इंतजार की जरूरत है, न माता-पिता की मेहरबानी की और न ही टिकट खरीदने के लिये घ्ंाटों लाइन में खड़े होने की और न ही सिनेमा हॉल में घुसने के लिये धक्का-मुक्की करने की, लेकिन एक समय था जब फिल्म देखना युद्ध जीतने के समान होता था और फिल्म देखकर आना एक उपलब्धि हासिल करने की तरह होती थी। उस समय स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिये ही नहीं, कॉलेज में पढ़ने वाले छात्रों के लिये भी फिल्म देखना बड़ी बात होती थी। उस समय के लाखों-करोड़ों बच्चों के लिये फिल्म देखना एक सपने की तरह था।

यह वह समय था जब बड़े-बड़े हरों में एक या दो सिनेमा हॉल होते थे और लोग मीलों-मील पैदल चलकर या बैलगाड़ी, तांगे, ट्रैक्टर या बस से लंबी दूरी तय करके सिनेमा देखने के लिये पहुंचते थे। मुझे याद है कि जब मै। आठवीं कक्षा में पढ़ता था तो लोग रसद-पानी का इंतजाम करके हमारे शहर के सिनेमा हॉलों में लगी फिल्म ‘‘जय संतोषी मां’’ तथा ‘‘शोले’’ देखने के लिये पहुंचते थे और टिकट नहीं मिलने के कारण एक-या दो रातें सिनेमा हॉल के पास के मैदान में ही गुजार देते थे। उस समय गांव में रहने वाले बच्चों की बात तो छोड़ियों, शाहर में रहने वाले हम जैसे बच्चों के लिये भी सिनेमा देखना बहुत मुश्किल था। यह तभी संभव हो पाता था जब पूरे परिवार के लोग किसी खास फिल्म को देखने जाते थे और ऐसा साल में दो-तीन बार से ज्यादा नहीं होता था। हमारे लिये सिनेमा देखना एक जश्न की तरह होता था, जिसके लिये हम कई-कई महीने की प्रतीक्षा करते थे और फिल्म देखकर आने के बाद उस फिल्म का नशा कई-कई महीनों तक – अगली फिल्म देखे जाने तक रहता था। दिमाग में हमेशा फिल्म के दृश्य घूमते थे और फिल्म के संवाद एवं गीत गूंजते रहते थे और जब हम बच्चे खेलने के लिये जमा होते थे तब हम उन दृश्यों एवं संवादों की नकल करते थे। जब भी कोई फिल्म देखकर आता था हम सब बैठकर फिल्म की कहानी सुनते थे। जब हम हाई स्कूल में थे तब मेरा एक दोस्त था जिनके पिताजी पटना साहिब से ट्रांसफर होकर आये थे और उस दोस्त ने कई फिल्में देख रखी थी। जब हम शाम को खेलने के लिये जमा होते थे तब वह अक्सर किसी न किसी फिल्म की कहानी सुनाता था – और हम सब उसे घेर कर उससे कहानी सुनते थे। यह प्रक्रिया इतनी दिलचस्प होती थी जितना दिलचस्प मेरे लिये आज फिल्म देखना भी नहीं है। उसने जिन फिल्मों की कहानियां सुनायी उनमें से कई फिल्में आज भी नहीं देखी, लेकिन ऐसा कभी नहीं लगा कि मैंने वह फिल्म नहीं देखी है। आप सोच सकते हैं कि उस समय फिल्म की कहानी सुनना जब इतना दिलचस्प हो सकता था तो फिल्म देखना कितना दिलचस्प होता होगा।

समय बदलने के साथ फिल्मोंं मेंं ‘‘कंटेंट’’ के स्तर पर आये बदलाव पर कोई टिप्पणी करने के बजाय मेरे कहने का आशय यह है कि जिस समय जब हमारी पहुंच फिल्मों और सिनेमा घरों तक नहीं थी और जब फिल्में देखने और फिल्मों के बारे में जानकारियां हासिल करने के आज जैसे साधन और माध्यम नहीं थे, तब भी हम पर सिनेमा एवं सिनेमा की हस्तियों का जबर्दस्त प्रभाव था। आज हालांकि जमाना काफी बदल गया है, लेकिन सिनेमा के प्रति लोगों की रुचियों एवं आकर्षण में कमी नहीं आयी, बल्कि समय के साथ इसमें वृद्धि ही हुयी है। हां, यह जरूर है कि बदलते समाज के साथ लोगों की बदलती सोच एवं रुचियों तथा नयी तकनीकों के आगमन ने फिल्म देखने के अंदाज को बदल दिया है। समाज में चाहे जितना बदलाव क्यों नहीं हुआ हो सिनेमा और सिनेमा के सितारों का समाज पर प्रभाव आज भी कायम है और पहले की तरह आज भी नायक और नायिकायें और सिनेमा की अन्य विधाओं की हस्तियां जनमानस के लिये आदर्श बन रहे है।

वैसे तो दुनिया के हर देश में फिल्मी सितारों के प्रशंसक होते हैं लेकिन केवल भारत ही ऐसा देश है जहां सिनेमा धर्म बन गया है। यहां फिल्मी कलाकारों की पूजा होती है, उनके नाम पर मंदिर बनते हैं, उनके नाम खून से पत्र लिखते हैं और उनके निधन पर लोग आत्मदाह करते हैं। फिल्म सितारों की झलक पाने के लिये उनके घरों, फिल्मों के प्रीमियर या ‘ाूटिंग के आसपास उनकी एक झलक पाने अथवा उनके आॅटोग्राफ लेने के लिये सिनेमा प्रेमियों की भीड़ जुटती है। कई नायक-नायिकायें और अन्य हस्तियां अपने प्रशंसकों के लिये भगवान बन हैं। मिसाल के तौर पर तेलुगू सिनेमा के एन टी रामाराव, एम जी रामचन्द्रन और जयललिता। ऐसा इसलिये कि सिनेमा में जनमानस को जीतने की क्षमता होती है। कहा जा सकता है कि समाज और जनमानस को सिनेमा ने जितनी गहराई तक प्रभावित किया है उतना कला या जनसंचार माध्यम के किसी अन्य रूप ने नहीं किया है। सिनेमा के ये सितारे अन्य क्षेत्रों की हस्तियों की तुलना में हमारे विचारों एवं हमारे दिलो-दिमाग पर अधिक राज करते हैं। ऐसे में हमारे मानस को प्रभावित करने वाले सिनेमा के इन सितारों एवं हस्तियों के बारे में जानना लाजिमी है और यह पुस्तक सामाजिक सोच को प्रभावित करने वाले सबसे सशक्त माध्यम सिनेमा की हस्तियों के बारे में जानकारियां देने के उद्देश्य से लिखी गयी है।

इस पुस्तक में शामिल हस्तियों की सूची तैयार करने में केवल उन्हीं हस्तियों को शामिल नहीं किया गया है जो अपने काल खंड में अत्यंत लोकप्रिय रहे हैं बल्कि इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि उन हस्तियों को भी शामिल किया जाये जिनका सिनेमा के विकास में खास योगदान रहा हो। सिनेमा की प्रमुख हस्तियों की चाहे कोई भी सूची बनायी जाये, विवाद होना स्वभाविक है क्योंकि हर व्यक्ति के नजरिये एवं पसंद में फर्क होते हैं। चाहे कितनी ही लंबी सूची क्यों नहीं बनायी जाये, वह सूची सम्पूर्ण नहीं मानी जा सकती, क्योंकि कुछ न कुछ नामों के छूटने की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। ऐसे में इस पुस्तक के मामले में इस बात की खास कोशिश की गयी है कि कोई महत्वपूर्ण नाम नहीं छूट जाये।

चूंकि यह पुस्तक हिन्दी सिनेमा की हस्तियों पर केन्द्रित है वैसे में दूसरी भाषाओं की अनेक बड़ी हस्तियों को इस पुस्तक में शामिल नहीं किया जा सका है, फिर भी सत्यजित राय, मृणाल सेन और कमल हसन जैसी हस्तियों को इसमें शामिल किया गया है क्योंकि उनका हिन्दी सिनेमा पर भी बहुत प्रभाव पड़ा और हिन्दी सिनेमा में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

इस पुस्तक के लिये विभिन्न हस्तियों का परिचय लिखने के दौरान उनके जीवन, कार्यों एवं योगदानों के अलावा समाज एवं सिनेमा के विकास की दृष्टि से उनके महत्व को भी रेखांकित करने की कोशिश की गयी है। आम तौर पर लोग पर्दे पर आने वाली हस्तियों से काफी हद तक वाकिफ होते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे विभिन्न स्तरों पर काम करने वाले लोगों एवं उनके महत्व से अवगत नहीं होते हैं, इसलिये इस पुस्तक में पर्दे पर दिखने वाली हस्तियों के साथ-साथ पर्दे के पीछे की हस्तियों के बारे में बराबर का महत्व दिया गया है। आज की पीढ़ी को मौजूदा समय की हस्तियों के बारे में तो पता है लेकिन बीते दिनों की उन हस्तियों के बारे में उतनी जानकारी नहीं हैं जिन्होंने अपने समय में आज के सितारों की तरह ही, बल्कि उनसे कहीं अधिक जनमानस पर अपना प्रभाव बनाया था और जिनके प्रयासों एवं योगदानों के कारण ही सिनेमा हम तक पहुंचा है।

उम्मीद है यह पुस्तक न केवल सिनेमा प्रेमियों को बल्कि आम पाठकों को भी पंसद आयेगी तथा यह पुस्तक सिनेमा के आरंभ से लेकर अब तक की विभिन्न विधाओं की हस्तियों के बारे में जानकारियां देने के अलावा सिनेमा के आठ दशक से अधिक समय की विकास यात्रा को भी समझने में मददगार साबित होगी।

– विनोद विप्लव

(मेरी आगामी पुस्तक सिनेमा के सितारे की भूमिका)

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